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कहानी 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की- जब भारतीय सेना ने लाहौर में घुसकर फहराया था तिरंगा

Posted on July 20, 2015August 4, 2016 by Pankaj Goyal

1965 India Pakistan war story in Hindi : आज हम आपको बता रहे है 1965 के इंडो-पाक युद्ध की कहानी।  यह युद्ध इसलिए विशेष रूप से याद किया जाता है की इस युद्ध में भारतीय सेना ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तान के लाहौर तक कब्ज़ा कर लिया था और लाहौर की सरजमी पर भारतीय तिरंगा लहरा दिया था।  तो आइए विस्तार से जानते है 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के घटनाक्रम को।

1965 की भारत-पाकिस्तान जंग में इंडियन नेवी ने अहम भूमिका नहीं निभाई थी। सात सितंबर 1965 को कमाडोर एस एम अनवर के नेतृत्‍व में पाकिस्‍तानी नेवी के एक बेड़े ने द्वारका स्थित नौसेना के रडार स्‍टेशन पर बमबारी कर दी। रडार स्‍टेशन पर हुए हमले का मामला संसद में भी गूंजा और इस वजह से रक्षा बजट 35 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 115 करोड़ रुपए कर दिया गया।

1965 India Pakistan war story in Hindi
लाहौर पुलिस स्टेशन पर तिरंगा

पाकिस्‍तानी सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्‍तानी नेवी की एक पनडुब्‍बी पीएनएस गाज़ी ने भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट करियर आईएनएस विक्रांत को पूरे युद्ध के दौरान बॉम्‍बे में घेर कर रखा था। भारतीय सूत्रों ने दावा किया था कि भारत पाकिस्‍तान के साथ नौसेना के मोर्चे पर जंग नहीं चाहता था और इसे जमीनी लड़ाई तक ही सीमित रखना था।

पाकिस्‍तानी सेना ने भारतीय एयरबेस पर घुसपैठ की और इन्‍हें तबाह करने के लिए कई गोपनीय ऑपरेशन चलाए। सात सितंबर 1965 को स्‍पेशल सर्विसेस ग्रुप के कमांडो पैराशूट के जरिए भारतीय इलाके में घुसे। पाकिस्‍तानी आर्मी के चीफ ऑफ आर्मी स्‍टाफ जनरल मुहम्‍मद मूसा के मुताबिक, करीब 135 कमांडो भारत के तीन एयरबेस (हलवारा, पठानकोट और आदमपुर) पर उतारे गए। हालांकि, पाकिस्‍तानी सेना को इस दुस्‍साहस की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और उसके केवल 22 कमांडो ही अपने देश लौट सके। 93 पाकिस्‍तानी सैनिकों को बंदी बना लिया गया। इनमें एक ऑपरेशन के कमांडर मेजर खालिद बट्ट भी शामिल थे। पाकिस्‍तानी सेना की इस नाकामी की वजह तैयारियों में कमी को बताया जाता है।

हालांकि, इतनी बड़ी नाकामी के बावजूद पाकिस्‍तानी सेना का दावा था कि उसके कमांडो मिशन से भारतीय सेना के कुछ ऑपरेशन प्रभावित हुए। भारतीय सेना की 14वीं इन्‍फ्रैंट्री डिविजन को पैराट्रूपर्स को पकड़ने के लिए डायवर्ट किया गया, तो पाकिस्‍तानी वायु सेना ने भारतीय सैनिकों के कई वाहनों को निशाना बनाया। इसी बीच, पाकिस्‍तान में यह खबर जंगल की आग की तरह फैली कि भारत ने पाकिस्‍तान के गुप्‍त ऑपरेशन का जवाब भी उसी की तर्ज पर दिया है और पाकिस्‍तानी जमीन पर कमांडो भेजे हैं।

भारत ने जब अंतरराष्‍ट्रीय सीमा पार की तो घटनाक्रम तेजी से बदला। सात सितंबर को चीन में पाकिस्‍तानी राजदूत ने चीन के तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति लियू शाओकी से मुलाकात की और अयूब खान की चिट्ठी दिखाते हुए उनसे चीन की मदद मांगी। इसके अगले दिन ही भारत पर ‘चिट्ठी बम’ की बरसात शुरू हो गई। चीन ने भारत पर आरोप लगाया कि उसने अक्‍साई चीन और सिक्‍किम में वास्तविक नियंत्रण रेखा के चीनी इलाके में सैनिकों को भेज दिया है। 1962 की जंग के बाद पहली बार ऐसे कथित घुसपैठ को कश्‍मीर के हालात से जोड़ा गया।

1965 की गर्मियों की शुरुआत होने को थी। पाकिस्तान भारत के अभिन्न अंग कश्मीर में घुसपैठ की कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर का प्लान बनाया। इसके तहत कश्मीर में घुसपैठ करने और भारतीय शासन के विरुद्ध विद्रोह करने का मंसूबा था। 5 अगस्त, 1965 को पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ युद्ध आगाज कर दिया।

26 हजार से 33 हजार पाकिस्तानी सैनिक कश्मीरी कपड़ों में एलओसी पार कर कश्मीर और उसके अंदरूनी इलाकों में घुस आए। 15 अगस्त को स्थानीय कश्मीरियों ने भारतीय सेना को सीमा उल्लंघन की जानकारी दी थी।

1965 India Pakistan war history in Hindi

भारत ने सैन्य कार्रवाई करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ हमला बोल दिया। शुरुआत में भारतीय सेना को सफलता मिली। उसने तीन पहाड़ियों पर कब्जा छुड़ा लिया। अगस्त के अंत तक पाकिस्तान ने तिथवाल, उरी और पुंछ के महत्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा जमा लिया। वहीं, भारतीय सेना ने भी पाकिस्तान शासित कश्मीर के हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया।

हाजी पीर दर्रे पर कब्जे से पाकिस्तानी फौज पूरी तरह से बौखला गई। उसे डर था कि मुजफ्फराबाद पर भी भारत कब्जा जमा सकता है। 1 सितंबर, 1965 को पाकिस्तान ने ग्रैंड स्लैम लॉन्च किया।

ग्रैंड स्लैम अभियान के तहत पाकिस्तान ने अखनूर और जम्मू पर व्यापक हमले शुरू कर दिए। ऐसा करके वह भारतीय सेना पर दबाव बनाने लगा। कश्मीर में रसद और अन्य सामग्री पहुंचाने के रास्ते पूरी तरह से बंद हो गए।

हाजी पीर दर्रे पर भारतीय कब्जे से पाकिस्तान राष्ट्रपति को लगा कि उनका ऑपरेशन जिब्राल्टर खतरे में है। उन्होंने और अधिक संख्या में सैनिक, तकनीक रूप से सक्षम टैंक भेजे। इस अचानक हुए हमले के लिए भारतीय फौज तैयार नहीं थी।

पाकिस्तान को इस वार का फायदा मिलने लगा। भारतीय सेना ने इस नुकसान की भरपाई के लिए हवाई हमले शुरू कर दिए। अगले दिन पाकिस्तान ने भी कड़ा प्रहार किया। उसने बदले में कश्मीर और पंजाब में भारतीय सेना और उसके अड्डों पर हवाई हमले किए।

कश्मीर में तेजी से पाकिस्तानी फौज को बढ़त मिल रही थी। वहीं, भारतीय फौज को इस बात का डर था कि अगर अखनूर हाथ से निकल गया तो कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाएगा

1965 India Pakistan war ka itihas

अखनूर बचाने के लिए भारतीय फौज ने पूरी ताकत झोंक दी। भारत के हवाई हमलों को विफल करने के लिए पाकिस्तान ने श्रीनगर के हवाई ठिकानों पर हमले किए। इन हमलों ने भारत की चिंता को बढ़ा दिया।

पाकिस्तान की स्थिति बेहतर होने के बावजूद भी भारत के आगे एक न चली। जानकार इसका सबसे बड़ा कारण पाकिस्तानी सेना का कमांडर बदलने को मानते हैं। जब अखनूर पर पाकिस्तान का कब्जा होने वाला था, तभी उसने अचानक सैनिक कमांडर बदल दिया।

अचानक हुए इस बदलाव से पाक सेना हक्की-बक्की रह गई। माना जाता है कि अगले 24 घंटों तक पाक सेना को कोई निर्देश नहीं दिया गया। इसका फायदा भारत को मिला। इस दौरान भारत ने अपनी अतिरिक्त सैनिक टुकड़ी और साजो-सामान अखनूर पहुंचा दिया।

इस तरह से अखनूर सुरक्षित हो सका। भारतीय सेना के कमांंडर भी आश्चर्यचकित थे कि पाकिस्तान इतनी आसानी ने जीती हुई बाजी क्यों हार रहा है। इसी बीच, सैनिक रणनीति के तहत भारत ने बड़ा ही कठोर फैसला लिया, जिसे भारत-पाकिस्तान युद्ध के इतिहास में अहम माना जाता है।

भारत के पश्चिमी कमान के सेना प्रमुख ने तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी को भारत-पाक पंजाब सीमा पर एक नया फ्रंट खोलने का प्रस्ताव दिया। हालांकि, सेनाध्यक्ष ने इसे तुरंत खारिज कर दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को यह बात जम गई। उन्होंने सेनाध्यक्ष के फैसले को काटते हुए इस हमले का आदेश दे दिया।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करते हुए पश्चिमी मोर्चे पर हमला करने की शुरुआत कर दी। द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेतृत्व में भारतीय फौज ने इच्छोगिल नहर को पार पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश किया। इच्छोगिल नहर भारत-पाक की वास्तविक सीमा थी।

तेजी से आक्रमण करती हुई भारतीय थल सेना लाहौर की ओर से बढ़ रही थी। इस कड़ी में उसने लाहौर हवाई अड्डे के नजदीक डेरा डाल लिया। भारतीय सेना की इस दिलेरी पाकिस्तान सहित अमेरिका भी दंग रह गया। उसने भारत से एक अपील की।

अमेरिका ने भारतीय सेना से कुछ समय के लिए युद्ध विराम करने का आग्रह किया, जिससे पाकिस्तान अपने नागरिकों को लाहौर से निकाल सके। भारत ने अमेरिका की बात मान ली। लेकिन इसका नुकसान भी उठाना पड़ा। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था।

पाकिस्तान ने लाहौर पर दबाव कम करने के लिए भारत के खेमकरण पर हमला कर दिया। उसका मकसद भारतीय फौज का लाहौर से ध्यान भटकाना था। बदले में भारत ने भी बेदियां और उसके आसपास के गांवों पर हमला कर कब्जे में ले लिया।

कश्मीर में नुकसान झेल चुकी भारतीय सेना को लाहौर में घुसने का फायदा यह मिला कि उसे अपनी सेना लाहौर की ओर भेजनी पड़ी। इससे अखनूर और उसके इलाकों में दबाव कम हो गया।

India Pakistan war story in Hindi
8 सितंबर को पाक ने भारत के मुनाबाओ पर हमला कर दिया। मुनाबाओ में पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए मराठा रेजीमेंट को भेजा गया, लेकिन रसद और कम सैनिक होने के कारण मराठा रेजीमेंट के कई जवान शहीद हो गए। आज इस चौकी को मराठा हिल के नाम से जाना जाता है।

10 सितंबर को मुनाबाओ पर पाक का कब्जा हो गया। खेमकरण पर कब्जे के बाद पाकिस्तान अमृतसर पर कब्जा करने के सपने संजोंने लगा। लेकिन भारतीय सेना द्वारा ताबड़तोड़ हमले से वह खेमकरण से आगे नहीं बढ़ पाई।

यहां की लड़ाई में 97 टैंक भारतीय सेना के कब्जे में आ गए थे, जबकि भारत के सिर्फ 30 टैंक ही क्षतिग्रस्त हुए थे। इसके बाद यह जगह अमेरिका में बने पैटन टैंक के नाम पर पैटन नगर के नाम से जानी जाने लगी।

इसके बाद अचानक दोनों सेनाओं की ओर से युद्ध की गति धीमी हो गई। दोनों ही एक-दूसरे के जीते हुए इलाकों पर नजर रखे हुए थे। इस जंग में भारतीय सेना के तकरीबन तीन हजार और पाक सेना के 3800 जवान मारे गए।

भारत ने युद्ध में 710 वर्ग किमी और पाकिस्तान ने 210 वर्ग किमी इलाके पर कब्जा जमा लिया। भारतीय सेना के कब्जे में सियालकोट, लाहौर और कश्मीर के उपजाऊ इलाके शामिल थे।

वहीं, दूसरी तरफ पाकिस्तान ने भारत के छंब और सिंध जैसे रेतीले इलाकों पर कब्जा कर लिया। क्षेत्रफल के हिसाब इस युद्ध में भारत को पाकिस्तान पर बढ़त मिल रही थी।

हर युद्ध का अंत होता है। इसका भी हुआ। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर दोनों देश 22 सितंबर को युद्ध विराम के लिए राजी हो गए। भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच 11 जनवरी, 1966 को ऐतिहासिक ताशकंद समझौता हुआ।

India Pakistan war history in Hindi
दोनों ने एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करते हुए विवादित मुद्दों को बातचीत से हल करने का भरोसा दिलाया। यह भी तय किया कि 25 फरवरी तक दोनों देश नियंत्रण रेखा से अपनी सेनाएं हटा लेंगे।

दोनों देश इस बात पर राजी हुए कि पांच अगस्त से पहले की स्थिति का पालन करेंगे और जीती हुई जमीन से कब्जा छोड़ेंगे। इस समझौते के एक दिन बाद शास्त्री जी की रहस्यमय परिस्थितियों से मौत हो गई। आधिकारिक तौर पर बताया गया कि उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

कई लोग इसे षड्यंत्र करार देते हैं। जानकारों का मानना है कि भारत-पाक समझौते में कुछ मसलों पर आम राय कायम न होने के चलते शास्त्री जी तनाव में आ गए थे।

इस युद्ध में आजादी के बाद पहली बार भारतीय वायु सेना और पाकिस्तानी वायुसेना ने एक-दूसरे का सामना किया था।

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1 thought on “कहानी 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की- जब भारतीय सेना ने लाहौर में घुसकर फहराया था तिरंगा”

  1. pravin kumar says:
    April 19, 2017 at 5:37 pm

    supper

    Reply

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