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ये हैं दीपावली और माता लक्ष्मी से जुड़ी प्रमुख मान्यताएं और उनके पीछे छिपा सन्देश

Posted on October 29, 2016November 7, 2018 by Pankaj Goyal

भारत में दीपावली का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। दीपावली व माता लक्ष्मी से जुड़ी अनेक मान्यताएं व परंपराएं हमारे देश में प्रचलित हैं। आज हम आपको दीपावली व लक्ष्मी से जुड़ी ऐसी ही मान्यताओं व परंपराओं के बारे में बता रहे है –

दीपावली पर क्यों खाते हैं खील-बताशे?

यह भी पढ़े-  दीपावली के पूजन में अवश्य शामिल करें ये 12 चीजें

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दीपावली धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति का त्योहार है। इस दिन मां लक्ष्मी का पूजन कर जीवनभर धन-संपत्ति की कामना की जाती है। खील-बताशे का प्रसाद किसी एक कारण से नहीं बल्कि उसके कई महत्व है, व्यवहारिक, दार्शनिक, और ज्योतिषीय ऐसे सभी कारणों से दीपावली पर खील-बताशे का प्रसाद चढ़ाया जाता है। खील यानी धान मूलत: धान (चावल) का ही एक रूप है। यह चावल से बनती है और उत्तर भारत का प्रमुख अन्न भी है।

दीपावली के पहले ही इसकी फसल तैयार होती है, इस कारण लक्ष्मी को फसल के पहले भाग के रूप में खील-बताशे चढ़ाए जाते हैं। खील बताशों का ज्योतिषीय महत्व भी होता है। दीपावली धन और वैभव की प्राप्ति का त्योहार है और धन-वैभव का दाता शुक्र ग्रह माना गया है। शुक्र ग्रह का प्रमुख धान्य धान ही होता है। शुक्र को प्रसन्न करने के लिए हम लक्ष्मी को खील-बताशे का प्रसाद चढ़ाते हैं।

इसलिए करते हैं देवी लक्ष्मी के साथ श्रीगणेश व सरस्वती की पूजा

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दीपावली पर माता लक्ष्मी के साथ माता सरस्वती व भगवान श्रीगणेश की पूजा भी की जाती है। लक्ष्मी धन की देवी हैं, सरस्वती ज्ञान की तथा गणपति बुद्धि के देवता हैं। इससे अभिप्राय है कि हम सिर्फ लक्ष्मी (धन) का ही आह्वान न करें, साथ ही सरस्वती (ज्ञान) व गणपति (बुद्धि) को भी बुलाएं। धन आए तो उसे अपने ज्ञान से संभालें और बुद्धि के उपयोग से उसे निवेश करें। इससे लक्ष्मी का स्थायी निवास होगा।

इसीलिए दीपावली हम लक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे घर में विराजे, साथ विद्या और बुद्धि भी लाएं। सरस्वती का स्थान लक्ष्मी की दांई ओर तथा गणपति का बांईं ओर होता है। इसके अभिप्राय है कि मनुष्य का दाई ओर का मस्तिष्क ज्ञान के लिए होता है। उस ओर हमारा ज्ञान एकत्र होता है और बांई ओर का मस्तिष्क रचनात्मक होता है। गणपति बुद्धि के देवता है, हमारी बुद्धि रचनात्मक होनी चाहिए।

दीपावली पर क्यों करते हैं दीपदान?

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धनतेरस से दीपावली तक नदी-तालाबों में दीपदान करने का प्रचलन है। शास्त्रों का मानना है कि दीपदान करने से नरक के दर्शन नहीं होते। दीपदान में लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र भी छिपे हैं। दरअसल दीपदान इस बात का संकेत है कि हम अपने जीवन में ज्ञान और धर्म का उजाला लाएंगे। अज्ञान और अधर्म के कारण ही व्यक्ति को नर्क के दर्शन होते हैं यानी मरने के बाद नर्क में जाना पड़ता है। अज्ञानता के कारण हम अच्छे-बुरे का भेद नहीं कर पाते, परमात्मा को नहीं पहचान पाते। ज्ञान आने पर यह परेशानी दूर हो जाती है। ज्ञान आता है तो उसके साथ ही धर्म भी हमारे जीवन में प्रवेश करता है।

दूसरा कारण प्रकृति से जुड़ा है। बारिश के मौसम के बाद प्रकृति का सौंदर्य पूरे निखार पर होता है। दीपदान के द्वारा हम प्रकृति यानी परमात्मा को यह विश्वास दिलाते हैं कि हम प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करेंगे। उनमें कभी अंधकार नहीं होने देंगे। अगर प्राकृतिक संसाधन समाप्त होंगे तो धरती पर ही नर्क उतर आएगा। इसलिए हम प्रकृति के संदेश वाहक जल स्रोतों में दीपदान कर यह संकल्प लेते हैं कि हम प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।

कमल के फूल पर ही क्यों बैठती हैं माता लक्ष्मी?

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महालक्ष्मी के चित्रों और प्रतिमाओं में उन्हें कमल के पुष्प पर विराजित दर्शाया गया है। इसके पीछे धार्मिक कारण तो है साथ ही कमल के फूल पर विराजित लक्ष्मी जीवन प्रबंधन का महत्वपूर्ण संदेश भी देती हैं। महालक्ष्मी धन की देवी हैं। धन के संबंध में कहा जाता है कि इसका नशा सबसे अधिक दुष्प्रभाव देने वाला होता है। धन मोह-माया में डालने वाला है और जब धन किसी व्यक्ति पर हावी हो जाता है तो अधिकांश परिस्थितियों में वह व्यक्ति बुराई के रास्ते पर चल देता है। इसके जाल में फंसने वाले व्यक्ति का पतन होना निश्चित है।

वहीं कमल का फूल अपनी सुंदरता, निर्मलता और गुणों के लिए जाना जाता है। कमल कीचड़ में ही खिलता है परंतु वह उस की गंदगी से परे है, उस पर गंदगी हावी नहीं हो पाती। कमल पर विराजित लक्ष्मी यही संदेश देती हैं कि वे उसी व्यक्ति पर कृपा बरसाती हैं जो कीचड़ जैसे बुरे समाज में भी कमल की तरह निष्पाप रहे और खुद पर बुराइयों को हावी ना होने दें। जिस व्यक्ति के पास अधिक धन है उसे कमल के फूल की तरह अधार्मिक कामों से दूरी बनाए रखना चाहिए। साथ ही कमल पर स्वयं लक्ष्मी के विराजित होने के बाद भी उसे घमंड नहीं होता, वह सहज ही रहता है। इसी तरह धनवान व्यक्ति को भी सहज रहना चाहिए, जिससे उस पर लक्ष्मी सदैव प्रसन्न रहे।

क्यों भगवान विष्णु के पैरों की ओर बैठती हैं माता लक्ष्मी?

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हम सभी ने भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के कई चित्र देखें हैं। अनेक चित्रों में भगवान विष्णु को बीच समुद्र में शेषनाग के ऊपर लेटे और माता लक्ष्मी को उनके चरण दबाते हुए दिखाया जाता है। माता लक्ष्मी यूं तो धन की देवी हैं तो भी वे भगवान विष्णु के चरणों में ही निवास करती हैं ऐसा क्यों? इसका कारण हैं कि भगवान विष्णु कर्म व पुरुषार्थ का प्रतीक हैं और माता लक्ष्मी उन्हीं के यहां निवास करती हैं जो विपरीत परिस्थितियों में भी पीछे नहीं हटते और कर्म व अपने पुरुषार्थ के बल पर विजय प्राप्त करते हैं जैसे कि भगवान विष्णु।

जब भी अधर्म बढ़ता है तब-तब भगवान विष्णु अवतार लेकर अधर्मियों का नाश करते हैं और कर्म का महत्व दुनिया को समझाते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि केवल भाग्य पर निर्भर रहने से लक्ष्मी (पैसा) नहीं मिलता। धन के लिए कर्म करने की आवश्यकता पड़ता है साथ ही हर विपरीत परिस्थिति से लड़ने का साहस भी आपने होना चाहिए। तभी लक्ष्मी आपके घर में निवास करेगी।

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