Ajab Gajab

Status, Shayari, Message, Vrat Katha, Pauranik Katha, Jyotish, News, Hindi Story, Religion, Health, Poem, Jokes, Kavita, Geet, Gazal, Wishes, SMS, Interesting Facts

Menu
  • Pauranik Katha
  • Jyotish
  • Quotes
  • Shayari
  • Amazing India
  • Self Improvment
  • Health
  • Temple
  • Bizarre
Menu

बभ्रुवाहन ने क्यों किया था अपने पिता अर्जुन का वध?

Posted on January 10, 2015February 24, 2016 by Pankaj Goyal

Babruvahana Arjuna Mahabharta Hindi Story : महाभारत की कथा में एक प्रसंग आता है जब बभ्रुवाहन एक युद्ध में अपने पिता अर्जुन का वध कर देता है।अर्जुन ने द्रोपदी और सुभद्रा के अलावा दो अन्य विवाह और किए थे। एक नाग कन्या उलूपी से जिससे की पुत्र अरावन पैदा हुआ था जिसने महाभारत युद्ध में अपनी स्वैचिछक बलि दी थी। तथा दूसरा विवाह किया था मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा से जिससे की पुत्र बभ्रुवाहन पैदा हुआ था, जिसने एक युद्ध में स्वयं अपने पिता का वध किया था। आइए विस्तारपूर्वक पढ़ते है की आखिर क्यों बभ्रुवाहन ने अपने पिता अर्जुन का वध किया तथा अर्जुन पुनः कैसे जीवित हुए। नाग कन्या उलूपी और अर्जुन पुत्र अरावन की कहानी के लिए यहाँ पढ़े-  http://goo.gl/Oy5fnh
why babruvahana killed arjuna
युधिष्ठिर ने किया अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय

महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह की मृत्यु से युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ। तब महर्षि वेदव्यास व श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया और धर्मपूर्वक शासन करने के लिए कहा। शोक निवारण के लिए महर्षि वेदव्यास ने युधिष्ठिर से अश्वमेध यज्ञ करने के लिए भी कहा। तब युधिष्ठिर ने कहा कि इस समय राजकोष खाली हो चुका है। अश्वमेध यज्ञ करने के लिए बहुत से धन की आवश्यकता होती है, जो अभी उपलब्ध नहीं है।

युधिष्ठिर की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास ने बताया कि पूर्व काल में राजा मरुत्त ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया था। उस यज्ञ में उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत सा सोना दिया था। बहुत अधिक मात्रा में होने के कारण ब्राह्मण वह सोना अपने साथ नहीं ले जा पाए। वह सोना आज भी हिमालय पर पड़ा है। उस धन से अश्वमेध यज्ञ किया जा सकता है। युधिष्ठिर ने ऐसा ही करने का निर्णय लिया।

महर्षि वेदव्यास के कहने पर पांडव हिमालय गए और वहां राजा मरुत्त के धन को प्राप्त कर लिया। उस धन को ढोने के लिए पांडव बहुत से हाथी-घोड़े व सेना लेकर गए थे। उनकी संख्या इस प्रकार है- साठ हजार ऊंट, एक करोड़ बीस लाख घोड़े, एक लाख हाथी, रथ और छकड़े। इनके अलावा गधों और मनुष्यों की तो गिनती ही नहीं थी। इस प्रकार इतना सारा धन पांडव हस्तिनापुर लेकर आए।

अर्जुन को बनाया था यज्ञ के घोड़े का रक्षक

पांडवों ने शुभ मुहूर्त देखकर यज्ञ का शुभारंभ किया और अर्जुन को रक्षक बना कर घोड़ा छोड़ दिया। वह घोड़ा जहां भी जाता, अर्जुन उसके पीछे जाते। अनेक राजाओं ने पांडवों की अधीनता स्वीकार कर ली। वहीं, कुछ ने मैत्रीपूर्ण संबंधों के आधार पर पांडवों को कर देने की बात मान ली। किरात, मलेच्छ व यवन आदि देशों के राजाओं ने यज्ञ को घोड़े को रोक लिया। तब अर्जुन ने उनसे युद्ध कर उन्हें पराजित कर दिया। इस तरह विभिन्न देशों के राजाओं के साथ अर्जुन को कई बार युद्ध करना पड़ा।

उलूपी ने उकसाया था बभ्रुवाहन को युद्ध के लिए

यज्ञ का घोड़ा घूमते-घूमते मणिपुर पहुंच गया। यहां की राजकुमारी चित्रांगदा से अर्जुन को बभ्रुवाहन नामक पुत्र था। बभ्रुवाहन ही उस समय मणिपुर का राजा था। जब बभ्रुवाहन को अपने पिता अर्जुन के आने का समाचार मिला तो उनका स्वागत करने के लिए वह नगर के द्वार पर आया। अपने पुत्र बभ्रुवाहन को देखकर अर्जुन ने कहा कि मैं इस समय यज्ञ के घोड़े की रक्षा करता हुआ तुम्हारे राज्य में आया हूं। इसलिए तुम मुझसे युद्ध करो।

जिस समय अर्जुन बभ्रुवाहन से यह बात कह रह था, उसी समय नागकन्या उलूपी भी वहां आ गई। उलूपी भी अर्जुन की पत्नी थी। उलूपी ने भी बभ्रुवाहन को अर्जुन के साथ युद्ध करने के लिए उकसाया। अपने पिता अर्जुन व सौतेली माता उलूपी के कहने पर बभ्रुवाहन युद्ध के लिए तैयार हो गया। अर्जुन और बभ्रुवाहन में भयंकर युद्ध होने लगा। अपने पुत्र का पराक्रम देखकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए।

बभ्रुवाहन उस समय युवक ही था। अपने बाल स्वभाव के कारण बिना परिणाम पर विचार कर उसने एक तीखा बाण अर्जुन पर छोड़ दिया। उस बाण को चोट से अर्जुन बेहोश होकर धरती पर गिर पड़े। बभ्रुवाहन भी उस समय तक बहुत घायल हो चुका था, वह भी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। तभी वहां बभ्रुवाहन की माता चित्रांगदा भी आ गई। अपने पति व पुत्र को घायल अवस्था में धरती पर पड़ा देख उसे बहुत दुख हुआ।

चित्रांगदा ने देखा कि उस समय अर्जुन के शरीर में जीवित होने के कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे। अपने पति को मृत अवस्था में देखकर वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसी समय बभ्रुवाहन को भी होश आ गया। जब उसने देखा कि उसने अपने पिता की हत्या कर दी है तो वह भी शोक करने लगा। अर्जुन की मृत्यु से दुखी होकर चित्रांगदा और बभ्रुवाहन दोनों ही आमरण उपवास पर बैठ गए।

संजीवन मणि द्वारा पुनर्जीवित हो गए थे अर्जुन

जब नागकन्या उलूपी ने देखा कि चित्रांगदा और बभ्रुवाहन आमरण उपवास पर बैठ गए हैं तो उसने संजीवन मणि का स्मरण किया। उस मणि के हाथ में आते ही उलूपी ने बभ्रुवाहन से कहा कि यह मणि अपने पिता अर्जुन की छाती पर रख दो। बभ्रुवाहन ने ऐसा ही किया। वह मणि छाती पर रखते ही अर्जुन जीवित हो उठे। अर्जुन द्वारा पूछने पर उलूपी ने बताया कि यह मेरी ही मोहिनी माया थी। उलूपी ने बताया कि छल पूर्वक भीष्म का वध करने के कारण वसु (एक प्रकार के देवता) आपको श्राप देना चाहते थे।

जब यह बात मुझे पता चली तो मैंने यह बात अपने पिता को बताई। उन्होंने वसुओं के पास जाकर ऐसा न करने की प्रार्थना की। तब वसुओं ने प्रसन्न होकर कहा कि मणिपुर का राजा बभ्रुवाहन अर्जुन का पुत्र है यदि वह बाणों से अपने पिता का वध कर देगा तो अर्जुन को अपने पाप से छुटकारा मिल जाएगा। आपको वसुओं के श्राप से बचाने के लिए ही मैंने यह मोहिनी माया दिखलाई थी। इस प्रकार पूरी बात जान कर अर्जुन, बभ्रुवाहन और चित्रांगदा भी प्रसन्न हो गए। अर्जुन ने बभ्रुवाहन को अश्वमेध यज्ञ में आने का निमंत्रण दिया और पुन: अपनी यात्रा पर चल दिए।

इस प्रकार अर्जुन अन्य देशों के राजाओं को पराजित करते हुए पुन: हस्तिनापुर आए। अर्जुन के आने की खबर सुनकर युधिष्ठिर आदि पांडव व श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए। तय समय पर उचित स्थान देखकर यज्ञ के लिए भूमि का चयन किया गया। शुभ मुहूर्त में यज्ञ प्रारंभ किया गया। यज्ञ को देखने के लिए दूर-दूर से राजा-महाराजा आए। पांडवों ने सभी का उचित आदर-सत्कार किया। बभ्रुवाहन, चित्रांगदा व उलूपी भी यज्ञ में शामिल होने आए।

यज्ञ संपूर्ण होने पर युधिष्ठिर ने पूरी धरती ब्राह्मणों को ही दान कर दी है। तब महर्षि वेदव्यास ने कहा कि ब्राह्मणों की ओर से यह धरती मैं पुन: तुम्हे वापस करता हूं। इसके बदले तुम सभी ब्राह्मणों को स्वर्ण दे दो। युधिष्ठिर ने ऐसा ही किया। युधिष्ठिर ने सभी ब्राह्मणों को तीन गुणा सोना दान में दिया। इतना दान पाकर ब्राह्मण भी तृप्त हो गए। ब्राह्मणों ने पांडवों को आशीर्वाद दिया। इस प्रकार अश्वमेध यज्ञ सकुशल संपन्न हो गया।

भारत के मंदिरों के बारे में यहाँ पढ़े –  भारत के अदभुत मंदिर
सम्पूर्ण पौराणिक कहानियाँ यहाँ पढ़े – पौराणिक कथाओं का विशाल संग्रह
महाभारत से सम्बंधित अन्य पौराणिक कथाएं –
  • सांपो के सम्पूर्ण कुल विनाश के लिए जनमेजय ने किया था ‘सर्प मेध यज्ञ’
  • उर्वशी ने क्यों दिया अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप ?
  • भीम में कैसे आया हज़ार हाथियों का बल?
  • कब, क्यों और कैसे डूबी द्वारका?
  • कैसे खत्म हुआ श्रीकृष्ण सहित पूरा यदुवंश?

Tag – Hindi, Story, Kahani, Katha, Pauranik, Dharmik, Mahabharat, why Babruvahana killed Arjuna, Babruvahana ne kyon kiya tha apne pita Arjun ka vadh,

Related posts:

स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि | महत्व | भगवान कार्तिकेय का जन्म कथा
मत्स्य जयंती की पौराणिक कथा
गुड़ी पड़वा क्यों, कैसे मनाते है | पौराणिक कथा
नारी गहने क्यों पहनती है? गहनों का महत्व
गोगाजी की जीवनी और गोगा नवमी की कथा
उनाकोटी - 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियां, क्या है रहस्य
नागपंचमी की पौराणिक कथाएं
युधिष्ठर को पूर्ण आभास था, कि कलयुग में क्या होगा ?
वरुथिनी एकादशी का महत्व, व्रत विधि एवं व्रत कथा, वरुथिनी एकादशी
आखिर ! भगवान श्री कृष्ण का दामोदर नाम क्यों पडा ।

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Daily Horoscope

04/16/26

Pages

  • AdTest
  • Contact Us
  • Disclaimer
  • Guest Post & Sponsored Post
  • Privacy Policy
©2026 Ajab Gajab | Design: Newspaperly WordPress Theme