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कहानी ‘ठग बेहराम’ की – गिनीज़ बुक में दर्ज़ है इनके नाम 931 सीरियल किलिंग का वर्ल्ड रिकॉर्ड

Posted on November 1, 2014December 29, 2015 by Pankaj Goyal

Thug Behram Story in Hindi : जिस रास्ते से वो गुजरता था, वहां कोसों दूर इंसान तो क्या इंसानों की छाप तक मिलनी बंद हो जाती थी। जहां-जहां भी वो जाता, लोग इलाका खाली कर उसकी पहुंच से दूर निकल जाते। जानते हैं क्यों ? इंसान के भेष में वो था एक खूंखार जानवर। पैसे के लिये वो लोगों को अपना निशाना बनाता था और उसका हथियार होता था रुमाल। जी हां एक पीला रुमाल ! वो रुमाल से देता था अपने शिकार को मौत। क्योंकि खून से लगता था दुनिया के सबसे खूंखार सीरियल किलर को डर। एक नहीं, दो नहीं, दो सौ नहीं तीन सौ नहीं पूरे 931 लोगों को उतारा था उसने अपने पीले रुमाल से मौत के घाट।

Thug Behram Story in Hindi
ठग बेहराम

व्यापारी, काफिला और पीला रुमाल… ये दास्तां है एक ऐसे ठग की जिसे दुनिया का आजतक का सबसे क्रूर सीरियल किलर का खिताब हासिल है। बेहराम नाम का वो ठग असल में था ‘बेरहम’ ठग। भोले-भाले व्यापारियों के काफिले को अपना निशान बनाता था वो ठग। बेहराम ठग का दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक इस कदर खौफ था कि लोगों ने इस रास्ते से चलना बंद कर दिया था।

(यह भी पढ़े – एलिजाबेथ बाथरी – कुंवारी लड़कियों को मारकर नहाती थी उनके खून से)

बेहराम ठग को समझने के लिए हमें उसी युग (1765-1840) में चलना होगा, जिसमें वो रहता था। 18वीं सदी खत्म होने को थी। मुगल साम्राज्य खत्म हो चला था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश में अपनी जड़े जमा ली थीं। ब्रिटिश-पुलिस देश में कानून व्यवस्था दुरूस्त करने में जुटी थी। लेकिन दिल्ली से जबलपुर के रास्ते में पड़ने वाले थानों मे कोई सा दिन ऐसा गुजरता था जब कोई पीड़ित आदमी अपने किसी करीबी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज ना कराने आता हो। अंग्रेज अफसर परेशान थे कि इतनी बड़ी तादाद में लोग कैसे गायब हो रहे थे।
कराची, लाहौर, मंदसौर, मारवाड़, काठियावाड़, मुर्शिदाबाद के व्यापारी बड़ी तादाद में रहस्यमय परिस्थितियो में अपने पूरे की पूरे काफिलों के साथ गायब थे। तिजारत करने जाते इन व्यापारियों के मुनीम और कारिंदे भी रास्ते से गायब हो जाते। लखनऊ की खूबसूरत तवायफ हों, डोली में बैठकर ससुराल जाती नई–नवेली दुल्हनें या फिर बंगाल से इलाहाबाद और बनारस की तीर्थयात्रा पर आने वाले दल, सभी रास्ते से गायब हो रहे थे। छुट्टी से घर लौट रहे ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों की टोली भी अपनी ड्यूटी पर नहीं लौट रही थीं। उनका भी कही कोई अता-पता नहीं था।

पुलिस की फाइले लगातार गायब हो रहे लोगो की शिकायतों से बढ़ती जा रही थीं। लेकिन अंग्रेज अफसर चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। आलम ये हो गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी को एक फरमान जारी करना पड़ा। फरमान के मुताबिक कंपनी-बहादुर का कोई भी सिपाही या सैनिक इक्का-दुक्का यात्रा नहीं करेगा। यात्रा करते वक्त सभी सैनिक बड़े झुंड में चले और अपनी साथ ज्यादा नकदी ना लेकर चले।

व्यापारी हो या फिर तीर्थयात्रा पर निकले श्रद्धालु या फिर चार धाम के यात्रा करने जा रहे परिवार, सभी निकलते तो अपने-अपने घरों से लेकिन ना जाने कहां गायब हो जाते, ये एक रहस्य ही था। काफिले में चलने वाले लोगों को जमीन खा जाती है या आसमां निगल जाता है, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। लेकिन सबसे हैरानी की बात ये थी कि पुलिस को इन लगातार गायब हो रहे लोगों की लाश तक नहीं मिलती थी। लाश मिलने के बाद पुलिस की तफ्तीश आगे बढ़ सकती थी। आखिर कैसे गायब हो रही थी लाशें।

सन् 1809 मे इंग्लैंड से भारत आने वाले अंग्रेज अफसर कैप्टन विलियम स्लीमैन को ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगातार गायब हो रहे लोगों के रहस्य का पता लगाने की जिम्मेदारी सौपी। थोड़े ही दिनों मे कैप्टन स्लीमैन को पता चल गया कि इन लोगों के गायब होने के पीछे किसका हाथ है। इन लोगों को गायब करने वाली था ठगों का एक गिरोह। एक ऐसा गिरोह जो करता था लूटपाट के लिये हत्या। इस गिरोह में करीब 200 सदस्य थे। इस गिरोह का मुखिया था बेरहाम ठग नाम का एक क्रूर इंसान, जो हाईवे और जंगलों पर अपने साथियों के साथ घोड़ों पर घूमता रहता। उसके निशाने पर होते थे तिजारत करने जाने वाले व्यापारी, अमीर सेठ और वेश्याएं। हर वो शख्स जिसके पास धन-दौलत होती थी वो बन जाता था ठगों का शिकार। बेहराम ठग के नेतृत्व में ही गिरोह के बाकी सदस्य लूटपाट और हत्याओं को अंजाम देते थे।

Captain William Slimen
कैप्टन विलियम स्लीमैन

ठगों के खिलाफ विलियम स्लीमैन ने पूरे उत्तर भारत में एक मुहिम छेड़ दी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने विलियम स्लीमैन को THUGEE AND DACOITY DEPARTMENT का इंचार्ज बना दिया। इस ऑफिस का मुख्यालय स्लीमैन ने जबलपुर में बनाया। स्लीमैन जानते थे कि जबलपुर और ग्वालियर के आस-पास ही ठग गिरोह सक्रिय है। ये दोनों ऐसी जगह थी जहां से देश के किसी भी कोने में जाने के लिये गुजरना पड़ता था। साथ ही साथ इस इलाके की सड़कें घने जंगल से होकर गुजरती थी। इसका फायदा ठग बडे आराम से उठाते थे। एक तो इन सुनसान जंगलों में किसी को भी निशाना बनाना आसान होता था साथ ही साथ अपने शिकार का काम तमाम करने के बाद यहां छिपना भी आसान था।

विलियम स्लीमैन ने जबलपुर में अपना मुख्यालय बनाने के बाद सबसे पहले दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक के हाईवे के किनारे जंगल का सफाया कर दिया। इसके बाद स्लीमैन ने गुप्तचरों का एक बडा जाल बिछाया। कहते हैं कि भारत में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की नींव तभी की रखी हुई है। गुप्तचरों की मदद से स्लीमैन ने पहले तो ठगों की भाषा को समझने की कोशिश की। ठग अपनी इस विशेष भाषा को ‘रामोसी’ कहते थे। रामोसी एक सांकेतिक भाषा थी जिसे ठग अपने शिकार को खत्म करते वक्त इस्तेमाल करते थे।

1. पक्के ठग को कहते थे बोरा या औला
2. ठगों के गिरोह के सरगना को कहते थे जमादार
3. अशर्फी को कहते थे गान या खार
4. जिस जगह सारे ठग इकठ्ठा होते थे उसे कहते थे बाग या फूर
5. शिकार के आस-पास मंडराने वाले को कहते थे सोथा
6. जो ठग सोथा की मदद करता था उसे कहते थे दक्ष
7. पुलिस को वो बुलाते थे डानकी के नाम से
8. जो ठग शिकार को फांसी लगता था उसे फांसीगीर के नाम से जाना जाता था।
9. जिस जगह शिकार को दफनाया जाता था उसे तपोनी कहते थे।

करीब 10 साल की कड़ी मशक्कत के बाद कैप्टन स्लीमैन ने आखिरकार बेहराम ठग को गिरफ्तार कर ही लिया। उसके गिरफ्तार होने के बाद खुला उत्तर भारत मे लगातार हो रहे हजारों लोगों के गायब होने का राज़। एक ऐसा राज़ जो सिर्फ उस बेरहम गिरोह को मालूम था।

गिरफ्तार होने के बाद बेहराम ठग ने बताया कि उसके गिरोह के कुछ सदस्य व्यापारियों का भेष बनाकर जंगलों में घूमते रहते थे। व्यापारियों के भेष में इन ठगों का पीछा बाकी गिरोह करता रहता था। रात के अंधेरे में जो भी व्यापारियों का काफिला जंगल से गुजरता था, नकली भेष धारण करने वाले ठग उनके काफिले में शामिल हो जाते थे। ठगों का ये गिरोह धर्मशाला और बाबड़ी (पुराने जमाने के कुएं) इत्यादि के आस-पास भी बेहद सक्रिय रहता था।

काफिले के लोगों को जब गहरी नींद आने लगती तो दूर से गीदड़ के रोने की आवाज आने लगती। ये गीदड़ की आवाज पूरे गिरोह के लिए एक सांकेतिक आदेश होता था कि अब काफिले पर हमला बोला जा सकता है। थोड़ी ही देर में अपने गिरोह के साथियों के साथ बेहराम ठग वहां पहुंचा जाता। सारे ठग पहले सोते हुये लोगों का मुआयना करते। बेहराम ठग अपने गुर्गे को अपना सबसे पसंदीदा रुमाल लाने का आदेश देता। पीला रुमाल मिलते ही बेरहाम ठग अपनी जेब से एक सिक्का निकालता और रुमाल में एक सिक्का डालकर गॉठ बनाता। सिक्के से गॉठ लगाने के बाद बेहरम ठग एक-एककर सोते हुये काफिले के लोगों का गला घोट देता।
काफिले में शामिल सभी लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद बेरहाम ठग साथियों के साथ मिलकर जश्न मनाता था। लेकिन जश्न से पहले उन्हें करना होता था एक और काम। ठग मरे हुये लोगों की लाशों के घुटने की हड्डी तोड़ देते। हड्डी तोड़ने के बाद लाशों को तोड़ मोड़कर मौका-ए-वारदात पर ही एक गड्डा खोदकर दबा दिया जाता। दरअसल, काफिले में शामिल व्यापारियों को मारने के बाद बेहराम ठग और उसके गिरोह के सदस्य उनकी वही कब्रगाह बना देते थे। अगर वही उनकी कब्रगाह बनाना संभव ना हुआ तो उनकी लाशों को पास के ही किसे सूखे कुएं या फिर नदी में फेंक देते थे। यही वजह थी कि पुलिस को गुमशुदा लोगों की लाश कभी नहीं मिलती थी। और ना ही इन ठगों का कोई सुराग मिल पाता था।

जब तक बेहराम ठग और उसके साथी काफिले के लोगों को ठिकाने नहीं लगा देते, तब तक उसके गिरोह के दो सदस्य दूर खड़े हुये पूरे इलाके पर नजर रखते। शिकार का काम तमाम होने तक वे दोनों हाथ में सफेद रुमाल लिये हिलाते रहते। सफेद रुमाल से वे दोनों ठगों को इशारा करते रहते कि सबकुछ ठीक है। जैसे ही उन्हें खतरे का अंदेशा होता वे दोनों सफेद रुमाल हिलाना बंद कर देते। सफेद रुमाल नीचे होते ही ठग चौकन्ना हो जाते। रुमाल हिलने लगता तो अपने काम में एक बार फिर से मशगूल हो जाते।

अपने शिकार का काम तमाम करने के बाद ठग मौका-ए-वारदात पर ही जश्न मनाते थे। जश्न के तौर पर जिस जगह मारे गये लोगों की कब्रगाह बनाई जाती थी उसके पहले नाच-गाना करते। कव्वाली का दौर चलता। गाने-बजाने से जब थक जाते तो कब्रगाह के ऊपर बैठकर ही वो गुड़ खाते थे।

कहते है ठग जिस किसी भी नए सदस्य को अपने गिरोह में शामिल करते थे तो उसे कब्रगाह पर बैठकर गुड़ जरुर खिलाया जाता था। एक बार कैप्टन स्लीमैन ने एक ठग से इसका कारण पहुंचा तो उसने जबाब दिया कि हजूर ‘तपोनी’ यानि कब्रगाह का गुड़ जिसने भी चखा उसके लिये दुनिया ही दूसरी हो गई। अगर आपने भी तपोनी का गुड़ खा लिया तो फौरन ठग बन जाओगे।

Peepal Tree
ऐसा माना जाता है की स्लीमनाबाद थाने में स्तिथ इसी पेड़ पर ठग बेहराम को फांसी दी गई थी।

बेहराम ठग ने गिरफ्तार होने के बाद खुलासा किया कि उसके गिरोह ने पीले रुमाल से पूरे 931 लोगो को मौत के घाट उतारा है। उसने ये भी खुलासा किया कि अकेले उसने ही 150 लोगों के गले में रुमाल डालकर हत्या की है। बेहराम की गिरफ्तारी के बाद उसके गिरोह के बाकी सदस्य भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए। बेहराम सहित जितने भी इस गिरोह के कुख्यात सदस्य थे उन्हे जबलपुर के पेड़ों पर फांसी दे दी गई—जबलपुर में ये पेड़ अभी भी हैं। गिरोह के जितने भी नये सदस्य थे उनके लिये स्लीमैन ने जबलपुर में ही एक सुधारगृह खुलवा दिया—इस बंदीगृह के अवशेष अभी भी जबलपुर में मौजूद हैं। कहते हैं कि हफ्ते में एक दिन जबलपुर में एक हाट लगता है। हाट में लगनी वाली दुकानों के अधिकतर मालिक उन्हीं ठगों की औलाद है जिन्हे स्लीमैन मुख्यधारा में लाया था।

कहते तो ये भी है कि स्लीमैन का एक पड़पोता इंग्लैड में रहता है और उसने अपने ड्राइंगरुम में उस पीले रुमाल को संजों कर रख रखा है। वही पीला रुमाल जिससे बेहराम ठग लोगों को मौत के घाट उतारता था और जिसके चलते उसे इतिहास का अबतक का सबसे बड़ा सीरियल किलर माना जाता है।

कैप्टन स्लीमैन के नाम पर बसा है स्लीमनाबाद :-

मध्य-प्रदेश के कटनी जिले में एक कस्बा है स्लीमनाबाद जो अंग्रेज अधिकारी कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन के नाम से बसा है। स्लीमनाबाद थाना का पुराना भवन कर्नल स्लीमन की चौकी माना जाता है। यहां स्लीमन की याद में एक स्मारक बनाया गया है। साथ ही दीवार पर स्लीमनाबाद की उत्पति संबंधी लेख भी लिखा है। जिसमें मप्र पुलिस का जनक कर्नल स्लीमन को बताया गया है।

Smaarak
कर्नल स्लीमन की याद में बना स्मारक

इतने साल गुजर जाने के बाद भी कर्नल स्लीमन के वंशज स्लीमनाबाद आते रहते हैं। कुछ साल पहले इंग्लेंड से स्लीमन के परिजन स्लीमनाबाद आए थे। कर्नल विलियम हेनरी स्लीमन की सातवीं पीढ़ी के वंशज स्टुअर्ट फिलिप स्लीमन लंदन निवासी स्टुअर्ट फिलिप स्लीमन, ससेक्स निवासी भाई जेरेमी विलियम स्लीमन के साथ भारत आए तो सबसे पहले स्लीमनाबाद ही आए। स्टुअर्ट फिलिप स्लीमन ने यहां लोगों से मुलाकात की और अपने पूर्वज के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी स्थानीय लोगों से ली। इससे पहले साल 2001 तथा 2003 में भी स्लीमन के वंशज स्लीमनाबाद आए थे।

पिंडारीयो और ठगों में था फर्क :-

इसी काल खंड में मध्य-भारत में पिंडारीयो का भी बड़ा आतंक था।  अधिकतर लोग इन दोनों समूहों को एक ही समझते है पर ऐसा नहीं है दोनों एक दूसरे से अलग समूह थे। दोनों के काम करने का तरीका भी अलग था। जहाँ ठग हाईवे और जंगलों में लोगों को चकमा (या बेवकूफ) बनाकर लूटते थे, वही पिंडारी डकैतों का समूह होता था जिसकी तादाद हजारों में थी। पिंडारी हथियारों से लैस होते थे और गांव के गांव और कस्बों तक को लूट लेते थे। पिंडारियों को मराठा राजाओं का सरंक्षण प्राप्त था। यही वजह है कि थर्ड आंग्लों-मराठा युद्ध को पिंडारी युद्ध के नाम से भी जाना जाता था। ठगी प्रथा का उन्मूलन जहां कैप्टन स्लीमैन ने किया था, पिंडारियों का खत्म करने का श्रेय जाता है लार्ड हैस्टींग्स और जॉन मैलक्म का जाता है। हां एक समानता है ठगों और पिंडारियों में–दोनों एक ही युग में थे यानि 18वीं शताब्दी के आखिर और 19वीं शताब्दी के शुरुआत में।

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