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पंच केदार – केदारनाथ के अलावा और भी है 4 केदार

Posted on May 16, 2017May 22, 2017 by Pankaj Goyal

Panch Kedar : उत्तराखंड का हिन्दू संस्कृति और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं। सारी दुनिया में भगवान शिव के अनेकों मंदिर हैं परन्तु उत्तराखंड स्थित पंच केदार सर्वोपरि हैं।शास्त्रों में उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम का बड़ा ही महात्म्य बताया गया है। लेकिन उत्तराखंड में ऐसे एक नहीं बल्कि चार और केदार हैं जिनका धार्मिक महत्व केदारनाथ के बराबर है। इन सभी धामों के दर्शन से व्यक्ति की कामना पूर्ण होती है। इन स्थानों में तुंगनाथ के महादेव, रूद्रनाथ, श्रीमध्यमहेश्वर एवं कल्पेश्वर प्रमुख हैं। भगवान शिव के ये चार स्थान केदारनाथ के ही भाग हैं।

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शिवपुराण के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने कुल-परिवार और सगोत्र बंधु-बाँधवों के वध के पाप का प्रायश्चित करने के लिए यहाँ तप करने आये थे। यह आज्ञा उन्हें वेदव्यास ने दी थी। पांडव स्वगोत्र-हत्या के दोषी थे। इसलिए भगवान शिव उनको दर्शन नहीं देना चाहते थे। भगवान शिव ज्यों ही महिष (भैंसे) का रूप धारण कर पृथ्वी में समाने लगे, पांडवों ने उन्हें पहचान लिया। महाबली भीम ने उनको धरती में आधा समाया हुआ पकड़ लिया। शिव ने प्रसन्न होकर पांडवों को दर्शन दिये और पांडव गोत्रहत के पाप से मुक्त हो गये। उस दिन से महादेव शिव पिछले हिस्से से शिलारूप में केदारनाथ में विद्यमान हैं। उनका अगला हिस्सा जो पृथ्वी में समा गया था, वह नेपाल में प्रकट हुआ, जो पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। इसी प्रकार उनकी बाहु तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमहेश्वर में और जटाएँ कल्पेश्वर में प्रकट हुईं। आइए अब जानते है भगवान शिव के पंच केदारों के बारे में-

1.केदारनाथ (Kedarnath) – 
यह मुख्य केदारपीठ है। इसे पंच केदार में से प्रथम कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, महाभारत का युद्ध खत्म होने पर अपने ही कुल के लोगों का वध करने के पापों का प्रायश्चित करने के लिए वेदव्यास जी की आज्ञा से पांडवों ने यहीं पर भगवान शिव की उपासना की थी। यहाँ पर महिषरूपधारी भगवान शिव का पृष्ठभाग यहा शिलारूप में स्थित है।

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कब जाएं – केदारनाथ जाने के लिए अप्रैल से अक्टूबर का समय सबसे अच्छा माना जाता है। इस बीच के बारीश के दिनों में यात्रा नहीं करना चाहिए।

कैसे पहुंचे- केदारनाथ जाने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार है। हरिद्वार से आगे का रास्ता सड़क मार्ग से तय किया जाता है। केदारनाथ की चढ़ाई बहुत कठिन मानी जाती है, कई लोग पैदल भी जाते हैं। केदारनाथ के लिए नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून है।

केदारनाथ के आस-पास के घूमने के स्थान –
उखीमठ- उखीमठ रुद्रप्रयाग जिले में है। यह स्थान समुद्री सतह से 1317 मी. की ऊचाई पर स्थित है। यहां पर देवी उषा, भगवान शिव के मंदिर है।
गंगोत्री ग्लेशियर- उत्तराखंड स्थित गंगोत्री ग्लेशियर लगभग 28 कि.मी लम्बा और 4 कि.मी चौड़ा है। गंगोत्री ग्लेशियर उत्तर पश्चिम दिशा में मोटे तौर पर बहती है और एक गाय के मुंह समान स्थान पर मुड़ जाती हैं।

2.मध्यमेश्वर (Madhyamaheshwar) – 
इन्हें मनमहेश्वर या मदनमहेश्वर भी कहा जाता हैं। इन्हें पंच केदार में दूसरा माना जाता है। यह ऊषीमठ से 18 मील दूरी पर है। यहां महिषरूपधारी भगवान शिव की नाभि लिंग रूप में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने अपनी मधुचंद्र रात्रि यही पर मनाई थी। यहां के जल की कुछ बूंदे ही मोक्ष के लिए पर्याप्त मानी जाती है।

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कब जाए- मध्यमेश्वर मंदिर जाने के लिए सबसे अच्छा समय गर्मी का माना जाता है। मुख्यतह यहां की यात्रा मई से अक्टूबर के बीच की जाती है।

कैसे पंहुचे-
हवाई मार्ग – हवाई मार्ग – उखीमठ से जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून की दूरी 196 कि.मी. की है। उखीमठ से उनीअना जाकर, वहां से मध्यमेश्वर की यात्रा की जा सकती है।
रेल मार्ग- उखीमठ से सबसे पास ऋषिकेश का रेल्वे स्टेशन है। इसकी दूरी 181 कि.मी. है। उखीमठ से उनीअना जाकर, वहां से मध्यमेश्वर की यात्रा की जाती है।
सड़क मार्ग – मध्यमेश्वर जाने के लिए सड़क मार्ग दिल्ली से होकर जाता है। दिल्ली से पहले उनिअना जाता पड़ता है। वहां से मध्यमेश्वर की दूरी मात्र 21 कि.मी. है।

मध्यमेश्वर के आस-पास के घूमने के स्थान-
बूढ़ा मध्यमेश्वर-मध्यमेश्वर से 2 कि.मी. दूर बूढ़ा मध्यमेश्वर नामक दर्शनीय स्थल है।
कंचनी ताल- मध्यमेश्वर से 16 कि.मी. दूर कंचनी ताल नामक झील है। यह झील समुद्री सतह से 4200 मी. की ऊचाई पर स्थित हैं।
गउन्धर- यह मध्यमेश्वर गंगा और मरकंगा गंगा का संगम स्थल है।

3.तुंगनाथ (Tungnath) – 
इसे पंच केदार का तीसरा माना जाता हैं। केदारनाथ के बद्रीनाथ जाते समय रास्ते में यह क्षेत्र पड़ता है। यहां पर भगवान शिव की भुजा शिला रूप में स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए स्वयं पांडवों ने करवाया था। तुंगनाथ शिखर की चढ़ाई उत्तराखंड की यात्रा की सबसे ऊंची चढ़ाई मानी जाती है।

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कब जाए- तुंगनाथ जाने के लिए सबसे अच्छा समय मार्च से अक्टूबर के बीच का माना जाता है।

कैसे पंहुचे-
हवाई मार्ग – हरिद्वार से जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून की दूरी 34.1 कि.मी. की है। हरिद्वार से किसी भी साधन द्वारा देहरादून तक जा कर वहां से तुंगनाथ की यात्रा की जा सकती है।
रेल यात्रा-तुंगनाथ के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हरिद्वार है, जो लगभग सभी बड़े स्टेशनों से जुड़ा हुआ है।
सड़क यात्रा- तुंगनाथ पहुंचने के लिए हरिद्वार से ही सड़क मार्ग का प्रयाग भी किया जा सकता है।

तुंगनाथ के आस-पास के घूमने के स्थान-
चन्द्रशिला शिखर- तुंगनाथ से 2 कि.मी की ऊचाई पर चन्द्रशिला शिखर स्थित है। यह बहुत ही सुंदर और दर्शनीय पहाड़ी इलाका है।
गुप्तकाशी- रुद्रप्रयाग जिले से 1319 मी. की ऊचाई पर गुप्तकाशी नामक स्थान है। जहां पर भगवान शिव का विश्वनाथ नामक मंदिर स्थित है।

4.रुद्रनाथ (Rudranath)-
यह पंच केदार में चौथे हैं। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव का मुख स्थित हैं। तुंगनाथ से रुद्रनाथ-शिखर दिखाई देता है पर यह एक गुफा में स्थित होने के कारण यहां पहुंचने का मार्ग बेदह दुर्गम है। यहां पंहुचने का एक रास्ता हेलंग (कुम्हारचट्टी) से भी होकर जाता है।

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कब जाए-
रुद्रनाथ जाने के लिए सबसे अच्छा समय गर्मी और वंसत का मौसम माना जाता है।

कैसे पंहुचे-
हवाई मार्ग – हरिद्वार से जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून की दूरी 258 कि.मी. की है। यहां तक हवाई मार्ग से पहुंचने के बाद सड़क मार्ग से रुद्रनाथ की यात्रा की जा सकती है।
रेल मार्ग –ऋषिकेश तक रेल माध्यम से पहुंचा जा सकता है, उसके बाद सड़क मार्ग की मदद से कल्पेश्वर जा सकते है।
सड़क मार्ग- रुद्रनाथ जाने के लिए ऋषिकेश, हरिद्वार, देहरादून से कई बसे चलती हैं।

5.कल्पेश्वर (Kalpeshwar) – 
यह पंच केदार का पांचवा क्षेत्र कहा जाता है। यहां पर महिषरूपधारी भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है। अलखनन्दा पुल से 6 मील पार जाने पर यह स्थान आता है। इस स्थान को उसगम के नाम से भी जाना जाता है। यहां के गर्भगृह का रास्ता एक प्राकृतिक गुफा से होकर जाता है।

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कब जाए-
कल्पेश्वर जाने के लिए गर्मी के मौसम में मार्च से जून के बीच और वंसत के मौसम में जुलाई से अगस्त का महीना सबसे अच्छा माना जाता है।

कैसे पंहुचे-
हवाई मार्ग – जोशीमठ, ऋषिकेश से जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून की दूरी 268 कि.मी. की है। यहां से कल्पेवर की यात्रा की जा सकती है।
रेल मार्ग – ऋषिकेश रेल्वे स्टेशन की देहरादून से 42 कि.मी. और हरिद्वार से 23.8 कि.मी. की दूरी है। ऋषिकेश तक रेल माध्यम से पहुंचा जा सकता है, उसके बाद सड़क मार्ग की मदद से कल्पेश्वर जा सकते है।
सड़क मार्ग- जोशीमठ, ऋषिकेश से सड़क मार्ग से आसानी से कल्पेश्वर पहुंचा जा सकता है।

कल्पेश्वर के आस-पास के घूमने के स्थान-
जोशीमठ- कल्पेश्वर से कुछ दूरी पर जोशीमठ नामक स्थान है। यहां से चार धाम तीर्थ के लिए भी रास्ता जाता है।

भारत के मंदिरों के बारे में यहाँ पढ़े – भारत के अदभुत मंदिर
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