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विवाह के 7 वचन, हिंदी अर्थ सहित

Posted on July 13, 2017 by Pankaj Goyal

Vivah Ke 7 Vachan With Hindi Meaning :- विवाह हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक माना जाता है। विवाह की सबसे खास रस्म मानी जाती है सात फेरे। पति और पत्नी अग्नि को साक्षी मानकर एक-दूसरे को 7 वचन देते हैं और जीवनभर उन वचनों का पालन करने की कसम भी खाते हैं। विवाह के दौरान पंडित इन 7 वचनों का संस्कृत भाषा में बोलते हैं, लेकिन आज हम आपको उन्हीं सातों फेरों का हिंदी अनुवाद करके बताने जा रहे हैं। इससे आप विवाह के दौरान लिए जाने वाले 7 फेरों का मतलब और महत्व जान पाएंगे।

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Vivah Ke 7 Vachan With Hindi Meaning

विवाह के 7 वचन | Vivah Ke 7 Vachan

पहला वचन
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!।

अर्थ
यदि आप कोई व्रत-उपवास, अन्य धार्मिक कार्य या तीर्थयात्रा पर जाएंगे तो मुझे भी अपने साथ लेकर जाएं। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।

दूसरा वचन
पुज्यो यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम!!

अर्थ
आप अपने माता-पिता की तरह ही मेरे माता-पिता का भी सम्मान करेंगे और परिवार की मर्यादा का पालन करेंगे। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

तीसरा वचन
जीवनम अवस्थात्रये पालनां कुर्यात
वामांगंयामितदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयं!!

अर्थ
आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

चौथा वचन
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ:।।

अर्थ
अब हम विवाह बंधन में बंध रहे हैं तो भविष्य में परिवार की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की जिम्मेमदारी आपके कन्धों पर हैं। अगर इसे स्वीकार करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

पांचवा वचन
स्वसद्यकार्ये व्यहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्‍त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या!!

अर्थ
अपने घर के कार्यों में, विवाह आदि, लेन-देन और अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी राय लिया करेंगे तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

छठा वचन
न मेपमानमं सविधे सखीना द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्वेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!

अर्थ
यदि मैं कभी सहेलियों के साथ रहूं तो आप सबके सामने कभी मेरा अपमान नहीं करेंगे। जुआ या किसी भी तरह की बुराइयां अपनेआप से दूर रखेंगे तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

सातवा वचन
परस्त्रियं मातूसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कूर्या।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तमंत्र कन्या!!

अर्थ
आप पराई स्त्रियों को मां सामान समझेंगे और पति-पत्नी के आपसी प्रेम के बीच अन्य किसी को भी नहीं आने देंगे। यदि आप यान वचन दें तो ही मैं आपने वामांग में आना स्वीकार करती हूं।

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