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टाइटैनिक से जुडी ये बातें मानी जाती है सच पर है पूरी तरह गलत

Posted on April 18, 2017June 29, 2017 by Pankaj Goyal

Myths and Facts about Titanic : अपने दौर के सबसे भव्य और सुरक्षित समझा जाने वाले टाइटैनिक जहाज को डूबे हुए 105 साल बीत चुके हैं। यह जहाज़ अपनी पहली यात्रा में ही दुर्घटनाग्रस्त होकर डूब गया था। 14 अप्रैल, 2012 की रात को टाइटैनिक हिमखंड से टकराया था और कुछ ही घंटों में 15 अप्रैल को तड़के पूरा का पूरा जहाज डूब गया था। इस भीषण दुर्घटना में 1,517 लोग मारे गए थे। बीते बरसों के दौरान टाइटैनिक को लेकर कई तरह की बातें होती रहीं और समय के साथ वे फैक्ट समझी जाने लगीं। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। यहां हम आपको बता रहे हैं टाइटैनिक से जुड़े 10 ऐसे फैक्ट, जो पूरी तरह से गलत हैं…

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Myth 1 – टाइटैनिक का हुल नंबर नो पोप के रूप में भी पढ़ा जा सकता था, इसलिए इस अनलकी नंबर की वजह से वह डूब गया?

Myths and Facts about Titanic
Fact 1 – बोट या शिप को सीरियल आइडेंटिफिकेशन नंबर दिया जाता है, जो हुल नंबर कहलाता है। कहा जाता है कि टाइटैनिक का हुल नंबर 360604 था, जिसे आईने में देखने पर No Pope लिखा हुआ दिखता था। लेकिन सच यह है कि टाइटैनिक का हुल नंबर 401 था। इस आईने में देखें, तो यह ROA की तरह दिखता है, जिसका फुल फॉर्म होगा- रिटर्न ऑन एसेट्स।

Myth 2 – टाइटैनिक में सामान रखने की जगह पर एक शापित ममी आमेन-रा भी थी। उसने नकारात्मक शक्तियों को अट्रैक्ट किया, जिसके चलते दुर्घटना हुई।


Fact 2 – बिल्कुल गलत। टाइटैनिक में कोई ममी नहीं थी। जब दुर्घटना हुई, उस दौर में आमेन-रा नामक वह ममी ब्रिटिश म्यूजियम में थी। जहाज में ममी होने की कहानी के पीछे वजह यह है कि टाइटैनिक पर एक स्पिरिचुअलिस्ट विलियम टी स्टीड भी सवार थे। उन्होंने डिनर के दौरान बाकी यात्रियों को आमेन-रा ममी की कहानी सुनाई थी। बाद में यह धारणा बनती गई वह ममी टाइटैनिक में थी।

Myth 3 – जहाज के निर्माता थॉमस एंड्रयूज आखिरी क्षणाें में स्मोकिंग रूम में शांति से खड़े थे?


Fact 3 – यह बात जॉन स्टीवर्ट नामक आई विटनेस की गवाही पर आधारित है। हालांकि जॉन टाइटैनिक से निकली 15वीं बोट में सवार थे। यह 1:40 पर चली थी। इसका मतलब हैं कि टाइटैनिक को पूरी तरह डूबने में भी 35-40 मिनट बाकी थे। दूसरी तरफ, एक अन्य अनाम प्रत्यक्षदर्शी ने आखिरी क्षणों में थॉमस एंड्रयूज को दूसरों की मदद करते देखा था।

Myth 4 – टाइटैनिक के कैप्टन एडवर्ड जॉन स्मिथ इस सफर के बाद रिटायर होने वाले थे। वे टाइटैनिक के सफर को अपने करियर में नगीने की तरह जड़ना चाहते थे।


Fact 4 – इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि कैप्टन स्मिथ टाइटैनिक की पहली यात्रा के बाद रिटायर होने वाले थे। दरअसल ये अफवाह थी, जो टाइटैनिक के सफर पर निकलने से पहले से चल रही थीं।

Myth 5 – टाइटैनिक में पर्याप्त लाइफबोट्स नहीं थीं। अगर होतीं तो ज्यादा पैसेंजर्स की जान बच सकती थी।


Fact 5 – यह बात भी गलत है। इसके विपरीत, यात्रा से पहले अधिकारियों ने देखा कि उसमें आवश्यक 16 बोट्स के अलावा 4 स्माॅल बोट्स भी हैं। हो सकता है कि टाइटैनिक की मजबूती और उसके डूबने की मामूली आशंका के चलते इतने को पर्याप्त माना गया हो। हालांक विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर ज्यादा बोट्स होतीं, तब भी ज्यादा यात्रियों को नहीं बचाया जा सकता था। इसका कारण यह है कि जहाज तेजी से डूबा तड़के 2:15 बजे उसके पूरी तरह डूबने से 5 मिनट पहले ही आखिरी लाइफबोट रवाना हुई थी।

Myth 6 – टाइटैनिक से दुनिया का पहला SOS कॉल हुआ था?


Fact 6 – नहीं। टाइटैनिक के सफर के बहुत पहले से SOS सिस्टम लागू था। दरअसल पहले ब्रिटिश जहाज इमरजेंसी में CQD मैसेज करते थे, जिसका मतलब होता था- सीक यू- डेंजर/डिस्ट्रेस। आपात स्थिति में मोर्स कोड के जरिए मैसेज भेजे जाते थे, जिसमें लैटर्स को डॉट्स से दर्शाया जाता था। सीक्यूडी लिखने पर डॉट्स में कन्फ्यूजन होता था, इसलिए 1906 में हुई दूसरी वर्ल्ड टेलीग्राफिक कॉन्फ्रेंस में एसओएस को इमरजेंसी मैसेज के रूप में चुना गया। इसमें कन्फ्यूजन की आशंका नहीं थी, क्योंकि SOS को मोर्स कोड में तीन डॉट, तीन हाइफन, तीन डॉट (…—…) से लिखा जाता था। 2012 में टाइटैनिक के सफर तक यह प्रचलन में आ चुका था, हालांकि फैक्ट यह है कि टाइटैनिक से पहले सीक्यूडी मैसेज भेजा गया, फिर एसओएस।

Myth 7 – तीसरे दर्जे के पैसेंजर्स को ताले में बंद कर दिया गया था, इसलिए वे बड़ी संख्या में मारे गए?


Fact 7 – टाइटैनिक के तीसरे दर्जे में करीब 700 लोग थे। उनमें से मात्र 180 लोग ही बच पाए थे। इसलिए भी ताले में बंद कर देने वाली थ्योरी को स्वीकार किया जाता है। लेकिन सच तो यह है कि जहाज के निचले हिस्से में बने तीसरे दर्जे से अपर डेक की ओर पहुंचने के लिए कई रास्ते थे। इसके अलावा, कई यात्री शांति से अपनी जगह पर बने रहे, क्योंकि वे सुन रहे थे कि उन्हें बचाने के लिए एक जहाज चल पड़ा है और एक घंटे में पहुंच जाएगा। इसलिए उन्होंने अफता-तफरी का हिस्सा बनने के बजाय नीचे ही रहना पसंद किया। तीसरे दर्जे के लोगों की ज्यादा मौतों का एक कारण यह भी समझा जाता है कि उनमें से बहुतों को अंग्रेजी नहीं आती थी, इसलिए वे इंस्ट्रक्शंस को नहीं समझ पाए।

Myth 8 – जहाज के कोल बंकर में लगी आग ने जहाज को कमजोर कर दिया था, जिसके कारण आइसबर्ग की टक्कर से वह धाराशायी हो गया?


Fact 8 – यह सच है कि टाइटैनिक के कोल बंकर में आग लगी थी, लेकिन उस पर काबू पा लिया गया था। इसके अलावा टाइटैनिक के जिस हिस्से पर क्षति दिखाई जाती है, वह कोल बंकर से 50 फुट की दूरी पर था।

Myth 9 – टाइटैनिक के मालिक ने पैसे बचाने के चक्कर में सुरक्षा मानकों की अनदेखी की और स्पीड बढ़ाने के लिए दबाव डाला।


Fact 9 – कहानियां टाइटैनिक की ओनर कंपनी व्हाइट स्टार लाइन के चेयरमैन जे ब्रूस को मुच्छड़ खलनायक के रूप में दिखाती हैं। उसके बारे में कहा जाता है कि उसने चंद पैसों की खामिर सेफ्टी स्टैंडर्ड की अनदेखी की और हजारों यात्रियों की जान को खतरे में डाल दिया। लेकिन यह सच नहीं लगता। जे ब्रूस कारोबारी था। वह अच्छी तरह जानता था कि टाइटैनिक की रेपुटेशन खराब हुई तो न तो कोई उसमें सफर करेगा, न ही कोई भविष्य में उसे खरीदेगा। ऐसी स्थिति में कंजूसी का सवाल नहीं उठता। फैक्ट तो यह है कि जे बूस ने अफसरों से जहाज में लाइफबोट्स की संख्या बढ़ाने की परमिशन मांगी थी। यह भी कहा जाता है कि उसने जहाज के कैप्टन पर स्पीड बढ़ाने के लिए दबाव डाला था। लेकिन कैप्टन की काफी इज्जत थी। बहुत से पैसेंजर उनके नाम पर ही सफर के लिए तैयार हुए थे। ऐसे में कैप्टन पर दबाव डालना और कैप्टन द्वारा सुरक्षा मानकों से समझौता कर स्पीड को तय सीमा से बढ़ाना संभव नहीं लगता।

Myth 10 – टाइटैनिक के लुकआउटर्स के पास दूरबीनें नहीं थीं। अगर दूरबीनें होतीं, तो वे आइसबर्ग को पहले ही देख लेते और दुर्घटना नहीं होती…


Fact 10 – यह पूरी तरह सच नहीं है। यह ठीक है कि टाइटैनिक के लुकआउटर्स को दूरबीनें नहीं मिल पाई थीं, लेकिन वे अगर होतीं भी, तो दुर्घटना को नहीं रोक पातीं। रास्ते की निगरानी करने वाले लोग पहले नंगी आंखों से चारों तरफ देखते हैं और जब उन्हें आगे कुछ संदेहास्पद नजर आता है, तब वे दूरबीन से उसे और बेहतर ढंग से देख पाते हैं। दूरबीन किसी एक जगह पर फोकस होती है। उससे खुली आंखों की तरह चारों तरफ नहीं देखा जा सकता। इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि दूरबीनें होतीं, तो दुर्घटना नहीं होती। वास्तव में, दुर्घटना के बाद जांच कमीशन के सामने फ्रेडरिक फ्लीट नामक लुकआउटर पेश हुआ था। चूंकि उसे बलि का बकरा बनाया जा रहा था, इसलिए उसने सारा दोष दूरबीन न होने पर मढ़ दिया था।

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