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	Comments on: कर्ण से जुडी कुछ रोचक बातें (Intersting Facts of Karna Mahabharata)	</title>
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		By: Dr. Manju agarwal		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dr. Manju agarwal]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Oct 2016 03:51:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[Please give the authentic source of these wonderful stories. .]]></description>
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		By: Bhupender Singh		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Bhupender Singh]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Jun 2016 11:12:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महाभारत में कोई एक नायक नहीं है अनेक महापुरुषों का वर्णन है फिर भी व्यासजी ने सबका चरित्र इतनी पूर्णता से किया है कि पात्र आज भी सजीव होकर मन पर छा जाते है । वे चाहे पाण्डु हों या धृतराष्ट्र, भीष्म हों या विदुर, द्रोण या द्रुपद भीम हों या दुर्योधन कर्ण हों या अर्जुन, युधिष्ठिर हों या कृष्ण ।
कर्ण की छवि द्रौपदी का अपमान किए जाने और अभिमन्यु वध में उसकी नकारात्मक भूमिका के कारण धूमिल भी हुई थी लेकिन कुल मिलाकर कर्ण को एक दानवीर और महान योद्धा माना जाता है।
कर्ण ने परशुराम की शरण ली और उनसे झूठ बोला कि मैं ब्राह्मण हूं। (ब्राह्मण अर्थात ब्रह्म ज्ञान को जानने वाला) परशुराम ने उन्हें ब्राह्मण पुत्र समझकर ब्रह्मास्त्र के प्रयोग की शिक्षा दे दी। परशुराम का प्रण था कि में सिर्फ ब्राह्मणों को ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दूंगा। परशुराम ने कर्ण को अन्य कई अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी और कर्ण पूर्ण रूप से अस्त्र-शस्त्र विद्या में पारंगत हो गए।
मनु स्मृति से हमें ज्ञात होता है कि सूत शब्द का प्रयोग उन सन्तानों के लिए होता था जो ब्राह्मण कन्या से क्षत्रिय पिता द्वारा उत्पन्न हों । लेकिन कर्ण तो सूत्र पुत्र नहीं, सूर्यदेव के पुत्र थे। इस सूत को कालांतर में बिगाड़कर शूद्र कहा जाने लगा। अंतत: शूद्र कौन, इसका भी अर्थ बदला जाने लगा।
कर्ण एक ऐसे व्यक्तित्व का उदाहरण है जो गुणी, दानवीर, न्यायप्रिय और साहसी था लेकिन फिर भी उसका पतन हुआ क्योंकि वह अधर्मी दुर्योधन के प्रति निष्ठावान था।
दुर्योधन के प्रति कर्ण के स्नेह के कारण, यद्यपि अनिच्छुक रूप से, उसने अपने प्रिय मित्र के पाण्डवों के प्रति सभी कुकर्मों में उसका साथ दिया। कर्ण को पाण्डवों के प्रति दुर्योधन की दुर्भावनापूर्ण योजनाओं का ज्ञान था। उसे यह भी ज्ञान था की असत के लिए सतसे टकराने के कारण उसका पतन भी निश्चित है। जबकि कुछ लोगों का यह मानना है की कुरु राजसभा में द्रौपदी के लिए &#039;वैश्या&#039; शब्द का उपयोग करके कर्ण ने अपने नाम पर स्वयं कालिख पोत ली थी।
अभिमन्यु के मारे जाने में कर्ण की भूमिका और एक योद्धा से अनेक योद्धाओं के लड़ने के कारण उसके एक महायोद्धा होने की छवि को कहीं अधिक क्षति पहुँची और फिर उसी युद्ध में उसकी भी वही गति हुई। महाभारत की कुछ व्याख्यायों के अनुसार, यही वह कृत्य था जिसने भली प्रकार से ये प्रमाणित कर दिया की कर्ण युद्ध में अधर्म के पक्ष में लड़ रहा है और इस कृत्य के कारण उसके इस दुर्भाग्य का भी निर्धारण हो गया की वह भी अर्जुन द्वारा इसी प्रकार मारा जाएगा जब वह शस्त्रास्त्र हीन और रथहीन हो और उसकी पीठ अर्जुन की ओर हो।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>महाभारत में कोई एक नायक नहीं है अनेक महापुरुषों का वर्णन है फिर भी व्यासजी ने सबका चरित्र इतनी पूर्णता से किया है कि पात्र आज भी सजीव होकर मन पर छा जाते है । वे चाहे पाण्डु हों या धृतराष्ट्र, भीष्म हों या विदुर, द्रोण या द्रुपद भीम हों या दुर्योधन कर्ण हों या अर्जुन, युधिष्ठिर हों या कृष्ण ।<br />
कर्ण की छवि द्रौपदी का अपमान किए जाने और अभिमन्यु वध में उसकी नकारात्मक भूमिका के कारण धूमिल भी हुई थी लेकिन कुल मिलाकर कर्ण को एक दानवीर और महान योद्धा माना जाता है।<br />
कर्ण ने परशुराम की शरण ली और उनसे झूठ बोला कि मैं ब्राह्मण हूं। (ब्राह्मण अर्थात ब्रह्म ज्ञान को जानने वाला) परशुराम ने उन्हें ब्राह्मण पुत्र समझकर ब्रह्मास्त्र के प्रयोग की शिक्षा दे दी। परशुराम का प्रण था कि में सिर्फ ब्राह्मणों को ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दूंगा। परशुराम ने कर्ण को अन्य कई अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी और कर्ण पूर्ण रूप से अस्त्र-शस्त्र विद्या में पारंगत हो गए।<br />
मनु स्मृति से हमें ज्ञात होता है कि सूत शब्द का प्रयोग उन सन्तानों के लिए होता था जो ब्राह्मण कन्या से क्षत्रिय पिता द्वारा उत्पन्न हों । लेकिन कर्ण तो सूत्र पुत्र नहीं, सूर्यदेव के पुत्र थे। इस सूत को कालांतर में बिगाड़कर शूद्र कहा जाने लगा। अंतत: शूद्र कौन, इसका भी अर्थ बदला जाने लगा।<br />
कर्ण एक ऐसे व्यक्तित्व का उदाहरण है जो गुणी, दानवीर, न्यायप्रिय और साहसी था लेकिन फिर भी उसका पतन हुआ क्योंकि वह अधर्मी दुर्योधन के प्रति निष्ठावान था।<br />
दुर्योधन के प्रति कर्ण के स्नेह के कारण, यद्यपि अनिच्छुक रूप से, उसने अपने प्रिय मित्र के पाण्डवों के प्रति सभी कुकर्मों में उसका साथ दिया। कर्ण को पाण्डवों के प्रति दुर्योधन की दुर्भावनापूर्ण योजनाओं का ज्ञान था। उसे यह भी ज्ञान था की असत के लिए सतसे टकराने के कारण उसका पतन भी निश्चित है। जबकि कुछ लोगों का यह मानना है की कुरु राजसभा में द्रौपदी के लिए &#8216;वैश्या&#8217; शब्द का उपयोग करके कर्ण ने अपने नाम पर स्वयं कालिख पोत ली थी।<br />
अभिमन्यु के मारे जाने में कर्ण की भूमिका और एक योद्धा से अनेक योद्धाओं के लड़ने के कारण उसके एक महायोद्धा होने की छवि को कहीं अधिक क्षति पहुँची और फिर उसी युद्ध में उसकी भी वही गति हुई। महाभारत की कुछ व्याख्यायों के अनुसार, यही वह कृत्य था जिसने भली प्रकार से ये प्रमाणित कर दिया की कर्ण युद्ध में अधर्म के पक्ष में लड़ रहा है और इस कृत्य के कारण उसके इस दुर्भाग्य का भी निर्धारण हो गया की वह भी अर्जुन द्वारा इसी प्रकार मारा जाएगा जब वह शस्त्रास्त्र हीन और रथहीन हो और उसकी पीठ अर्जुन की ओर हो।</p>
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		By: Rishi Rajan		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rishi Rajan]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 May 2016 03:43:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[Quite interesting it is!]]></description>
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